हाँ, ज़िन्दगी संघर्ष तो नहीं है, लेकिन कश्मकश ज़रूर है !
आख़िरकार हम इंसान हैं, सिर्फ पेट भर जाए, इतने से काम नहीं न चलता है हमारा !
कुछ और चाहिए ही रहता है, कितना भी कुछ मिल जाए !
ज़िंदा रहना भर नहीं है न, जीने का भी कार्यक्रम बनाना ही रहता है !
ऐसा नहीं है कि हम मन के गुलाम हैं, कई बार मन को मारा है!
ऐसा भी नहीं है कि स्वार्थी हैं हम, कई बार अपने को भूल कर दूसरे की भलाई की है हमने !
ऐसा भी नहीं है कि बहुत लालची ही हैं हम, कई बार अपने उसूलों के लिए समझौता नहीं किया है हमने !
हाँ पर एक बात है, कोई हमें कुछ कम समझे, कोई हमें भाव न दे, ये बर्दाश्त नहीं होता !
अन्याय कहते हैं क्या इसे ? हाँ तो बस फिर यही अच्छा नहीं लगता हमें !
सारे दुःख की जड़ है ये, यहीं से शुरुआत होती है हर कहानी की !
जहाँ सब ठीक है, वहां कहानियाँ कहाँ बनती हैं भला !
सत्य की, ठीक की कोई कहानी नहीं होती है, वो तो अपेक्षित ही होता है न... हमेशा, सबसे !
न्याय की कोई बात ही नहीं करता, सारा रस संघर्ष का है, बदले का है !
उसी की कहानियाँ और कथाएं !
कभी कभी तो ऐसा लगने लगता है कि जीवन सहज नहीं हो सकता !
इस दुनिया में संघर्ष या फिर समझौता दोनों में से किसी एक दिशा में तो बह ही जाती है जीवन की नदी !
और ऊँची नीची पहाड़ियों घाटियों से होते हुए एक दिन आँखें मीच लेती है, एक अबूझे रहस्यमय समुद्र में मिल जाती है !
पर हमारे पास तर्क है, धर्म है, राज्य आदि सब है , जीवन को सरल बनाने को !
तो हम बनाते रहते हैं उसूल, भजन और कानून !
अपनी मान्यताओं को लेकर जीते रहते हैं, साहस भी नहीं होता उन्हें छोड़ पाने का !
आखिर उनके ही कारण तो जीवन में कुछ आकार है, हम कुछ हैं ये आभास है !
और फिर छोड़ भी दें तो पकड़ेंगे क्या
कोई छाती ठोंक के ये भी तो नहीं कहता, आओ मैं हूँ, निश्चिन्त होकर एक क्षण मेरी गोद में सर रखकर बेख़ौफ़ सो जाओ !
तुम रहोगे, सोने के बाद भी !
कोई जीने का आश्वासन भी नहीं देता, कोई नहीं कहता कि कोई जी भी सकता है !
सब मरने की बातें सुनाते हैं, मरने के बाद का बीमा कराते हैं !
कल्पना को रंगते हैं सात रंगों से , और एक इंद्रधनुष बनाते हैं !
हम बहुत डरते हैं जीने से, क्योंकि उसके बाद तो मरना पड़ेगा न ,
जिन्दा रहे, जिए नहीं तो फिर भी पुनर्जन्म का विश्वास रहता है !
आख़िरकार हम इंसान हैं, सिर्फ पेट भर जाए, इतने से काम नहीं न चलता है हमारा !
कुछ और चाहिए ही रहता है, कितना भी कुछ मिल जाए !
ज़िंदा रहना भर नहीं है न, जीने का भी कार्यक्रम बनाना ही रहता है !
ऐसा नहीं है कि हम मन के गुलाम हैं, कई बार मन को मारा है!
ऐसा भी नहीं है कि स्वार्थी हैं हम, कई बार अपने को भूल कर दूसरे की भलाई की है हमने !
ऐसा भी नहीं है कि बहुत लालची ही हैं हम, कई बार अपने उसूलों के लिए समझौता नहीं किया है हमने !
हाँ पर एक बात है, कोई हमें कुछ कम समझे, कोई हमें भाव न दे, ये बर्दाश्त नहीं होता !
अन्याय कहते हैं क्या इसे ? हाँ तो बस फिर यही अच्छा नहीं लगता हमें !
सारे दुःख की जड़ है ये, यहीं से शुरुआत होती है हर कहानी की !
जहाँ सब ठीक है, वहां कहानियाँ कहाँ बनती हैं भला !
सत्य की, ठीक की कोई कहानी नहीं होती है, वो तो अपेक्षित ही होता है न... हमेशा, सबसे !
न्याय की कोई बात ही नहीं करता, सारा रस संघर्ष का है, बदले का है !
उसी की कहानियाँ और कथाएं !
कभी कभी तो ऐसा लगने लगता है कि जीवन सहज नहीं हो सकता !
इस दुनिया में संघर्ष या फिर समझौता दोनों में से किसी एक दिशा में तो बह ही जाती है जीवन की नदी !
और ऊँची नीची पहाड़ियों घाटियों से होते हुए एक दिन आँखें मीच लेती है, एक अबूझे रहस्यमय समुद्र में मिल जाती है !
पर हमारे पास तर्क है, धर्म है, राज्य आदि सब है , जीवन को सरल बनाने को !
तो हम बनाते रहते हैं उसूल, भजन और कानून !
अपनी मान्यताओं को लेकर जीते रहते हैं, साहस भी नहीं होता उन्हें छोड़ पाने का !
आखिर उनके ही कारण तो जीवन में कुछ आकार है, हम कुछ हैं ये आभास है !
और फिर छोड़ भी दें तो पकड़ेंगे क्या
कोई छाती ठोंक के ये भी तो नहीं कहता, आओ मैं हूँ, निश्चिन्त होकर एक क्षण मेरी गोद में सर रखकर बेख़ौफ़ सो जाओ !
तुम रहोगे, सोने के बाद भी !
कोई जीने का आश्वासन भी नहीं देता, कोई नहीं कहता कि कोई जी भी सकता है !
सब मरने की बातें सुनाते हैं, मरने के बाद का बीमा कराते हैं !
कल्पना को रंगते हैं सात रंगों से , और एक इंद्रधनुष बनाते हैं !
हम बहुत डरते हैं जीने से, क्योंकि उसके बाद तो मरना पड़ेगा न ,
जिन्दा रहे, जिए नहीं तो फिर भी पुनर्जन्म का विश्वास रहता है !
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